उन्नत होंगे किसान तभी संभव है देश की तरक्की

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साल 2020 में जब कोरोना ने भारत में दस्तक दी तो सरकार ने जनता की भलाई के लिए तालाबंदी यानि कि लॉकडाउन को विकल्प के तौर पर चुना।

जहाँ देश के हर सरकारी/गैर सरकारी दफ्तरों में बंदी हो गई। वहीं फैक्टरियों और मजदूरी पर भी पूरी तरह से रोक लग गई। सरकार का इस ओर बिल्कुल भी ध्यान ही नहीं गया कि जो गरीब वर्ग एक राज्य से दूसरे राज्य या गांव से शहरों में रोजगार के लिए आते हैं, जिन्हें रोजाना काम ढूंढने के लिए मसक्कत करनी पड़ती है, तब जाकर दो वक़्त का भोजन नसीब होता है

उन पर इस तालाबंदी का क्या असर होगा ? एक बार गरीब मजदूर वर्ग कोरोना से तो लड़ लेगा लेकिन काम न होने की वजह से भूख से कैसे लड़ेगा ?

सरकार का काम था कोरोना से बचाव का उपाय ढूंढना सो तालाबंदी की लेकिन क्या सरकार को मजदूर वर्ग को वापस घर भेजने की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए थी ?

जिस तरह से अमीरों के बच्चों को विदेश से और महंगे संस्थानों से वापस घर भेजने के लिए सरकार परिवहन की व्यवस्था कर सकती थी, क्या वही व्यवस्था गरीब मजदूरों के लिए नहीं कर सकती थी? आखिर वे भी तो देश के नागरिक हैं, मतदान देकर सरकार वे भी तो बनाते हैं, अप्रत्यक्ष रूप से कर तो वे भी देते हैं तो फिर उनकी नाकद्री क्यों की गई ?

खैर कोई बात नहीं मजदूर वर्ग इतना भी कमजोर नहीं जो अव्यवस्थाओं के आगे हार मान जाता, उसने जतन किया और निकल पड़ा अपने परिवार और गृहस्थी को समेट कर वापस अपने गाँव की तरफ। तपती धूप और नंगे पाँव भी इनके हौसले को कमजोर नहीं कर पाए

लेकिन इस कठिन सफर में इन्हें न तो सरकार की तरफ से किसी भी तरह का आर्थिक सहयोग मिला न ही कोई चिकित्सकीय सुविधा, न ही कोई परिवहन की व्यवस्था की गई। हाँ सरकार की नींद तब खुली जब सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों के पैदल घर वापसी पर सरकार से जवाब मांगा।

इस कठिन सफर में कई मजदूरों के बच्चों ने अपना दम रास्ते में ही तोड़ दिया। इन सारी बातों के बीच एक बात गौर करने वाली ये है कि गरीब मजदूर, जिससे कोरोना के समय काम छिन चुका था,

आख़िर वो गाँव वापस क्यों आ रहा था ? वो वजह थी सिर्फ किसान की फसलें। जिसके दम पर वह खेतों में काम करके मजदूरी कमा सकता था और अपने तथा अपने पर परिवार का दो वक्त पेट भर सकता था। सोचिए अगर किसान न होता और फसलें न होती तो मजदूर वर्ग किसके भरोसे कोरोना काल में जीवन यापन करता ?

आज की बात करें तो यही किसान, जिसकी वजह से हर एक नागरिक भर पेट भोजन पा लेता है,अपनी फसलों के उचित मूल्य के लिए कड़कड़ाती ठंड में बैठकर भूख हड़ताल कर रहा है। उत्तर भारत और पश्चिम भारत के भोजन में गेंहू का अपना अहम योगदान है। देश में गेहूँ की 60% पैदावार सिर्फ पंजाब में होती है। आज देश के कुछ राज्यों , जिसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि हैं, के किसान नए कृषि बिल के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। उनको खालिस्तानी समर्थक कहकर संबोधित किया जा रहा है।

जिस कृषि बिल के लिए किसान धरना दे रहे हैं वो न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर भी है। किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू थी। अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके

लेकिन किसानों को लगता है कि सरकार नए कृषि बिल में न्यूनतम मूल्य को खत्म कर रही है जबकि सरकार का कहना है कि नए कृषि कानून के हिसाब से किसान अपनी फसल को देश में कहीं भी बेंच सकेगा

लेकिन उसके लिए उसे रेजिस्ट्रेशन कराना होगा यानि वो किसान रजिस्टर्ड होना चाहिए लेकिन राज्य सरकारों का ये भी कहना है कि उनके राज्यों में जो फसलें होती हैं वो पहले अपने राज्य के किसानों से उसे खरीदेंगे।

फिर जो किसान रजिस्टर्ड नहीं हैं वो अपनी फसल दूसरे राज्यों में कैसे बेचेंगे ? इसके साथ साथ जो किसान दूसरे राज्यों में अपनी फसल बेचने गए भी और उनकी फसल नहीं बिकी तो उनके नुकसान की भरपाई कैसे होगी ? क्या सरकार को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए था अगर कृषि बिल को बनाने में कुछ कमी रह भी गई है तो क्या किसानों से बात करके उसमें सुधार नहीं करना चाहिए ?

15 दिन से देश का किसान ठंड में बैठकर धरना दे रहा है जिसमें महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चियां भी शामिल हैं और हम उन्हें खालिस्तानी घोषित कर रहे हैं क्या इसलिए ही हम जय जवान और जय किसान का नारा देते हैं !! देश की जनता और सरकारों को ये नहीं भूलना चाहिए कि देश की समृद्धि और तरक्की में इन किसानों का बहुत बड़ा योगदान होता है।

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