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Friday, August 14, 2020
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भारतीय लोकतंत्र को कौन कमजोर कर रहा है?

क्लीन पॉलिटिक्स मूवमेंट – स्वच्छ राजनीति अभियान

#CleanPolitics एक आंदोलन है जिसकी शुरुआत सुनील बुटोलिया ने की है, उनके अनुसार भारतीय राजनीति में सुधार की आवश्यकता है। क्योंकि सुधार सिर्फ राजनेता ही कर सकते हैं इसलिए वे अपने फायदे के सुधार ही करते हैं जिसके कारण राजनीति बहुत ही मैली हो चुकी है।

आप भी सुनील बुटोलिया द्वारा सुझाये गए उपायों को देखें और अपनी राय कमेंट करें।

आखिर राजनैतिक दलों का क्या महत्व है?

राजनैतिक दल आखिर करते क्या हैं? इनकी स्थापना क्यों की गई है?

भारत की आजादी के समय देश के हालात जो भी हों लेकिन वर्तमान के हालात यदि देखे जायें तो सैकड़ों राजनीतिक पार्टियां बनाई जा चुकी हैं जिनसे राजनीति में प्रतियोगिता बढ़ी है। लेकिन वे छोटी पार्टियां कभी भी लोगों की आवाज को नहीं उठा पातीं क्यों उनके पास बहुमत नहीं होता है, वे सिर्फ कुछ सीटों पर चुनाव जीतकर किसी बड़ी पार्टी के साथ मिल जाती हैं।

अब बात यदि बड़ी पार्टियों की करें तो उनके मुद्दे देश की जरूरत के आधार पर ना होकर उनकी निजी विचारधारा पर आधारित होते हैं। उदाहरण के लिए भाजपा पार्टी को ही लेते हैं उन्होंने अपनी सैकड़ों वर्षों पुरानी हिन्दूवादी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए NRC बिल लाये जबकि उससे संविधान की मूल भावना को नुकसान हो रहा है साथ ही देश की जनता में आपस में भेदभाव हो रहा है। इसलिए मेरा मानना है कि जब तक राजनीतिक दल रहेंगे तब तक उनकी विचारधारा भी रहेगी।

हमें देश को मजबूत लोकतंत्र देना है तो राजनीतिक दलों के रूप में छिपी हुई उन विचारधाराओं को तोड़ना होगा। और ऐसा तभी हो सकता है जब देश को राजनीतिक दल विहीन कर दिया जाए। उदाहरण के लिए अमेरिका में मात्र 2 ही राजनीतिक दल हैं। वहां राजनीतिक दल की कोई विचारधारा नहीं होती वे सिर्फ अपने देश के लिए व देशवासियों के लिए कार्य करते हैं।

नेताओं के लिए भी होना चाहिए एंट्रेंस एग्जाम

जी हाँ आपने एकदम ठीक सुना है, नेताओं के लिए भी एक एग्जाम होना बहुत ही जरूरी है क्योंकि वर्तमान समय में कोई भी अनपढ़ व्यक्ति आकर चुनावों में खड़ा हो जाता है और उसको शिक्षा मंत्री बनाया दिया जाता है। बिना अनुभव के ही किसी को मनचाहा मंत्रालय दे दिया जाता है।

जिस तरह से नौकरियों में अनुभव और शिक्षा को वरीयता दी जाती है ठीक उसी तरह नेताओं के लिए भी शिक्षा व अनुभव जरूरी होना चाहिए। तभी देश में सबकुछ ठीक हो पायेगा।

अभी सबकुछ पार्टियों के हाथों में है वो मनचाहा प्रोपगंडा फैलाकर मनचाहे उम्मीदवारों को चुनावों की टिकट देकर चुनाव जीत जाते हैं। मनचाहे कानून लागू करते हैं भले ही वह कानून जनता के लिए नुकसानदायक हो।

ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं नोटबन्दी हो या जीएसटी हो हर तरह से भाजपा सरकार ने जनता को रुलाया है। अब तो रेलवे को निजी हाथों में दे दिया है, निजी हाथों में जाते ही रेलवे ने भी मनुवादी सोच दिखाना शुरू कर दिया, हाल ही में उसने भर्ती के लिए जो विज्ञापन जारी किया है उसमें उम्मीदवार का वैश्य या ब्राह्मण होना जरूरी बताया है, जब पकड़े गए तो इसको लिपिकीय गलती बता दिया।

कुल मिलाकर सरकार उन्हीं नीतियों को लागू करती है जिनसे उनके नेताओं, पार्टी, व उनके चहेते बिजनेसमैनों को लाभ हो सके। जनता का क्या होना है इससे किसी को कोई लेना देना नहीं रहा है। सरकार को सुधारना है तो हमें चुनाव से ही शुरुआत करते हुए नेताओं को सुधारना होगा और वह तभी होगा जब परीक्षा के जरिये योग्य उम्मीदवार आगे आएंगे।

युवाओं की सोच पर कब्जा नहीं होना चाहिए।

राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए विश्विद्यालयों में विद्यार्थियों के दिमाग और उनकी सोच पर कब्जा जमाने के लिए उनको राजनीति में आने के लिए प्रेरित करते हैं।

यह बात सही है कि विद्यार्थियों के हक के लिए आवाज उठाने के लिए एक लीडर की जरूरत होती है लेकिन इसके लिए क्या जरूरत है कि वह लीडर किसी राजनीतिक पार्टी से ही होगा?

बात विद्यार्थियों के हक की हो रही है फिर यदि उनके ऊपर किसी राजनीतिक दल का दबाव हो जाता है तब उनके विचार भी उस राजनीतिक दल के विचारों का प्रभाव तो पड़ेगा ही।

कहने का तात्पर्य है विद्यार्थी वहां शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं ताकि देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सकें वहीं जब उनपर राजनीतिक दल की विचारधारा थोपी जाएगी तो वे विकास के बारे में सोच ही नहीं पाएंगे वे तो सही गलत में फर्क किये बिना बस एक राजनीतिक दल के पिछलग्गू बनकर रह जाते हैं। जिस उम्र में उनको अपना करियर बनाना होता है उसी उम्र में राजनीतिक दलों द्वारा उनके दिलों में नफरत और भेदभाव का जहर भरा जाता है।

पूर्व नेताओं को आजीवन सुविधा क्यों?

पहले की बात अलग थी जब नेता अपने देश और समाज को सुधारने के मकसद से राजनीति में आते थे तब वे एक समाज सुधारक की हैशियत से राजनीति करते थे तब उनको उनके कार्यों और मेहनत के लिए आजीवन सुविधाएं देना उचित लगता है।

लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे, अब राजनीति में ग्लेमर आ चुका है। लोग अब पैसा, शोहरत और ऐशोआराम की जिंदगी जीने के मकसद से राजनीति में आ रहे हैं। वे अब वे अपने कार्यकाल में तनख्वाह से सैकड़ों हजारों गुना संपत्ति अर्जित कर लेते हैं जबकि पहले के समाज सेवी पुरानी धोती कुर्ते में जीवन गुजार दिया करते थे। ऐसे में उनको आजीवन सुविधाएं देंना न्यायसंगत नहीं लगता है।

प्रधानमंत्री अपने दल से ज्यादा देश का सेवक होता है।

भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब एक प्रधानमंत्री ने अपने पद की गरिमा की परवाह किये बिना अपने भाषणों से यह जता दिया कि उसके लिए उसकी राजनीतिक पार्टी से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसा इसलिए क्यों एक प्रधानमंत्री को देश के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए जबकि प्रधानमंत्री जी अपने भाषणों में दूसरे राजनीतिक दल पर कीचड़ उछालने के लिए उसके पूर्वजों को भी नहीं बख्शते।

एक प्रधानमंत्री के लिए उसकी खुद की राजनीतिक पार्टी से भी बढ़कर देश होना चाहिए जब वह खुद की राजनीतिक पार्टी का गुलाम बना रहेगा तो वह दूसरे दलों की बुराई करता रहेगा ऐसे में वह देश की भलाई के लिए कुछ नहीं कर पायेगा।

अधिक बार चुने गए नेता को बनाया जाए प्रधानमंत्री

यदि कोई नेता अधिक बार चुना जाता है इसका साफ मतलब है कि वह अपने कार्यों के लिए लोकप्रिय है वह लोगों के मुद्दों को हल करता है, यानि वह अच्छा समाज सेवक है। इसलिए ऐसे नेताओं को प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा जाना चाहिए। भले ही वह किसी भी राजनीतिक दल से हो।

आरक्षित सीटों का दुरुपयोग रोकना होगा

वर्तमान समय में हम देख सकते हैं कि किस तरह से आरक्षित सीटों पर उन खास लोगों को टिकट दी जाती है जिनका आरक्षित वर्ग से और उनकी जरूरतों से कोई लेना देना नहीं होता है यानि आरक्षित सीटों का दुरुपयोग। इस दुरुपयोग को रोका जाना चाहिए इसे रोकने के लिए उन लोगों को टिकट दी जानी चाहिए जो बहुजनों के हक के लिए आवाज उठाते हैं, आंदोलनों में आगे रहकर लड़ते हैं। लेकिन जब तक राजनीतिक दलों को टिकट वितरण का अधिकार रहेगा तब तक आरक्षित सीटों का दुरुयोग होता रहेगा और मूक बहुजन संसद में जाते रहेंगे जो ना कुछ बोल सकते हैं ना किसी गलत चीज का विरोध कर सकते हैं।

राजनैतिक दल के हित से ज्यादा देशहित पर जोर देना होगा।

#चुनावों के लिए राजनीतिक दल द्वारा टिकट वितरण करने के बजाय, चुनाव आयोग द्वारा प्रदान की जानी चाहिए, चुनाव प्रक्रिया किसी राजनीतिक दल के हित में नहीं बल्कि #देशहित में होनी चाहिए।

दलबदल को हल्के में ना लें

अपने फायदे के लिए जिस मर्जी पार्टी में घुस जाना अपने समाज को धोखा देने के बराबर है। नेता अपनी पार्टी में रहते हुए दूसरी पार्टी के नेताओं पर कीचड़ उछालते रहते हैं लेकिन जब उस नेता को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाना पड़ता है तब दूसरी पार्टी के नेता उसके लिए अच्छे कैसे हो जाते हैं?

ऐसा भी होता है कि चुनाव जीतने के बाद जो पार्टी अधिक पैसा देती है नेता उसी पार्टी में चला जाता है इसलिए दल बदलने पर कठोर कार्यवाही होनी चाहिए व नेता बनने की योग्यता भी रद्द हो जानी चाहिए।

पार्टी को मिलने वाले चन्दे के पीछे का सच

भाजपा ने सरकार बनने के तुरन्त बाद कानून में बदलाव करते हुए यह फैसला किया कि अब पार्टी को मिलने वाले चन्दे की कोई जांच नहीं होगी व उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं होगा। लेकिन ऐसा क्यों? राजनीतिक दल को आखिर पैसों की क्या जरूरत पड़ी है? विधायक खरीदने के लिए?

Sunil Butoliahttp://sunilbutolia.com
Founder & Editor-In-Chief of FAME Publish Sunil Butolia, is an Indian digital marketer, businessman, activist and philanthropist. Sunil is also the host of the FAME Podcast where he interviews the most successful business owners, leaders and change makers in the world.

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